Kali Chalisa pdf: काली चालीसा PDF, काली चालीसा सिद्ध करने की विधि

काली माँ हिन्दु धर्म की एक प्रमुख देवी हैं। काली का अर्थ काल एवं काळा रंग से है। माँ काली को देवी दुर्गा के 10 महा शक्ति स्वरूपों में से एक माना गया है। Kali Chalisa pdf (काली चालीसा PDF) को निचे लिंक में दे दिया है। आप लिंक पर क्लिक कर फ्री में प्राप्त कर सकते है।

माँ काली की उत्पत्ति धर्म की रक्षा एवं संसार से अन्धकार मिटाने के लिए हुई है। शास्त्रों के अनुसार, नवरात्री या किसी भी शुभ अवसर पर माँ काली की अराधना के लिए काली चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। वैसे अनेक लोग काली चालीसा का नियमित पाठ भी करते हैं।

आदिशक्ति माँ भगवती निराकर होकर भी समस्त जगत के दुखों का नाश करने के लिए प्रत्येक युग में साकार रूप धारण करके अवतार लेती हैं। शास्त्रों के अनुसार, माँ काली की उत्पत्ति धर्म की रक्षा एवं राक्षसों का विनाश करने के लिए हुई थी। काली माँ की पूजा विशेषकर असम एवं बंगाल में होती है।

इनकी महिमा अनंत है। ये आदिशक्ति का एक स्वरुप है। इन्हीं से समस्त जगत एवं सृष्टि है। ऐसा माना जाता है कि, माता पार्वती ने देवताओं और समस्त ब्रह्माण्ड की राक्षसों से रक्षा के लिए एवं राक्षसों का विनाश करने के लिए माँ काली का अवतार लिया था।

ऐसा माना गया है कि, महादेव के महाकाल अवतार में देवी काली के रूप में उनके साथ थीं। काली माँ को शक्ति एवं बल की देवी कहा जाता है। माँ काली की आराधना करने से समस्त संकट एवं भय समाप्त हो जाते हैं। माँ काली का गुणगान शब्दों से नहीं, भावों से किया जाता है। माँ काली की महिमा अपरंपार है। काली चालीसा पढ़ने वालों पर माँ काली की सदा कृपा बनी रहती है।

Kali Chalisa pdf लिंक

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Kali Chalisa pdf संक्षिप्त विवरण

File Name Kali Chalisa Pdf
File TypePDF
LanguageHindi
CategoryReligion
No. of Pages6 Pages
File Size516
File StatusActive
Uploaded ByRajesh Kushwaha

Kali Chalisa Pdf Lyrics

काली चालीसा pdf लिरिक्स हिंदी भाषा में दे दिया गया है। आप अपने सुविधानुसार Kali Chalisa को लिरिक्स से याद कर सकते है।

माँ काली चालीसा

॥दोहा॥


जयकाली कलिमलहरण,
महिमा अगम अपार ।
महिष मर्दिनी कालिका,
देहु अभय अपार ॥
॥ चौपाई ॥
अरि मद मान मिटावन हारी ।
मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥

अष्टभुजी सुखदायक माता ।
दुष्टदलन जग में विख्याता ॥

भाल विशाल मुकुट छवि छाजै ।
कर में शीश शत्रु का साजै ॥

दूजे हाथ लिए मधु प्याला ।
हाथ तीसरे सोहत भाला ॥4॥

चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे ।
छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥

सप्तम करदमकत असि प्यारी ।
शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥

अष्टम कर भक्तन वर दाता ।
जग मनहरण रूप ये माता ॥

भक्तन में अनुरक्त भवानी ।
निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥8॥

महशक्ति अति प्रबल पुनीता ।
तू ही काली तू ही सीता ॥

पतित तारिणी हे जग पालक ।
कल्याणी पापी कुल घालक ॥

शेष सुरेश न पावत पारा ।
गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥

तुम समान दाता नहिं दूजा ।
विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥12॥

रूप भयंकर जब तुम धारा ।
दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥

नाम अनेकन मात तुम्हारे ।
भक्तजनों के संकट टारे ॥

कलि के कष्ट कलेशन हरनी ।
भव भय मोचन मंगल करनी ॥

महिमा अगम वेद यश गावैं ।
नारद शारद पार न पावैं ॥16॥

भू पर भार बढ्यौ जब भारी ।
तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥

आदि अनादि अभय वरदाता ।
विश्वविदित भव संकट त्राता ॥

कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा ।
उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥

ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा ।
काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥20॥

कलुआ भैंरों संग तुम्हारे ।
अरि हित रूप भयानक धारे ॥

सेवक लांगुर रहत अगारी ।
चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥

त्रेता में रघुवर हित आई ।
दशकंधर की सैन नसाई ॥

खेला रण का खेल निराला ।
भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥24॥

रौद्र रूप लखि दानव भागे ।
कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥

तब ऐसौ तामस चढ़ आयो ।
स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥

ये बालक लखि शंकर आए ।
राह रोक चरनन में धाए ॥

तब मुख जीभ निकर जो आई ।
यही रूप प्रचलित है माई ॥28॥

बाढ्यो महिषासुर मद भारी ।
पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥

करूण पुकार सुनी भक्तन की ।
पीर मिटावन हित जन-जन की ॥15॥

तब प्रगटी निज सैन समेता ।
नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥

शुंभ निशुंभ हने छन माहीं ।
तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥32॥

मान मथनहारी खल दल के ।
सदा सहायक भक्त विकल के ॥

दीन विहीन करैं नित सेवा ।
पावैं मनवांछित फल मेवा ॥17॥

संकट में जो सुमिरन करहीं ।
उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥

प्रेम सहित जो कीरति गावैं ।
भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥36॥

काली चालीसा जो पढ़हीं ।
स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥

दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा ।
केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥

करहु मातु भक्तन रखवाली ।
जयति जयति काली कंकाली ॥

सेवक दीन अनाथ अनारी ।
भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥40॥

॥दोहा॥
प्रेम सहित जो करे,
काली चालीसा पाठ ।
तिनकी पूरन कामना,
होय सकल जग ठाठ ॥

माँ चालीसा का पाठ कैसे करें

सनातन धर्म में माँ काली को महाकाली, कालरात्रि एवं काली माता के नाम से भी जाना जाता है। माँ काली को माँ दुर्गे के समस्त अवतारों में से सबसे शक्तिशाली माना गया है। माँ काली शत्रुओं का विनाश करती हैं। एवं अपने समस्त भक्तों की सदा रक्षा करतीं हैं। माँ काली को प्रसन्न कर उनकी कृपा एवं आशीर्वाद पाने के लिए नियमित रूप से काली चालीसा का पाठ करना चाहिए। काली चालीसा को पढ़ने से समस्त संकट एवं परेशानियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

वैसे तो माँ काली की पूजा प्रतिदिन करनी चाहिए। परन्तु शुक्रवार का दिन माँ काली की पूजा के लिए शुभ माना गया है। काली चालीसा का पाठ नियमानुसार करना चाहिए। यदि काली माँ की पूजा नियमानुसार न की जाये तो वो रुष्ट हो सकतीं हैं। माँ काली की पूजा करने के पश्चात काली चालीसा एवं माँ काली की आरती अवश्य करनी चाहिए।

माँ काली की पूजा 2 प्रकार से की जाती है। एक तंत्र पूजा होती है, दूसरी सामान्य पूजा होती है। तंत्र पूजा किसी ज्ञानी, जानकार पंडित के बिना करना आसान नहीं है। इस पूजा को विभिन्न तंत्र-मन्त्रों द्वारा किया जाता है। इसलिए आप नियमित रूप सामान्य पूजा कर सकते हैं। सामान्य पूजा को करने के नियम इस प्रकार हैं।

  • माँ काली की पूजा के लिए शुक्रवार का दिन अत्यंत शुभ एवं लाभकारी होता है।
  • शुक्रवार के दिन प्रातः काल उठकर स्नान करने के पश्चात लाल अथवा गुलाबी वस्त्र पहने।
  • काली माता के मंदिर जाएँ, एवं वहां धुप एवं दीपक जलाने के पश्चात गुलाब का फूल काली माता के चरणों में अर्पित करें।
  • माँ काली चालीसा का पाठ करें। पाठ करने के पश्चात अंत में अपनी परेशानियां बताते हुए माता से प्रार्थना करें।

घर में सामान्य पूजा करने का तरीका

घर में काली माता को आमंत्रित करने के लिए एक स्वागतनुमा वातावरण तैयार करें। वैसे माँ काली की पूजा अमावस्या के दिन की जाती है। इस वजह से पूजा करने के स्थान को दीपों से सजाएं। एवं काली माँ की मूर्ति अथवा फोटो को लाल कपडे से बिछाते हुए आसन पर स्थापित करें। इसके बाद एक थाली में चावल, नमक, फूल, जल ,मिठाई, 7 प्रकार के अनाज, गंगाजल, मेवे, पान के पत्ते, चन्दन, हल्दी, सिंदुर, लाल रंग के फूल, पीले चावल, अष्ट गंध ,कपूर, धुप,चन्दन शंख, घी इत्यादि चीजें रखें।

फिर काली माँ की मूर्ति अथवा फोटो को फूलों की माला पहनाएं। एवं माँ काली के चरों में फूल अर्पित करें। इसके पश्चात इसके पश्चात पूजा स्थल पर नमक का जल छिड़कें। एवं चावल से एक त्रिकोण बनाएं। एवं यह ध्यान रखें कि, त्रिकोण का सिरा काली माँ की तरफ हो। फिर माँ काली को प्रणाम करते हुए विधि-विधान के अनुसार, पहले गणेश पूजन करें। उसके पश्चात माँ काली की पूजा आरम्भ करें।

तत्पश्चात काली के नाम का जप करें एवं काली चालीसा का पाठ ककरते हुए स्तुति गायें। इसके बाद काली जी की आरती करें। एवं अंत में समस्तगण काली माता की मूर्ति के समीप जाकर हाथ जोड़कर सच्चे ह्रदय एवं भक्ति के साथ काली माता से प्रार्थना करते हुए उनका आशीर्वाद लें। इसके पश्चात सभी को प्रसाद दें।

माँ काली चालीसा के लाभ

श्री काली चालीसा माँ काली की अराधना में लिखी एक काव्य रचना है। इसमें माँ काली की महानता, उनके शौर्य एवं पराक्रम का वर्णन किया गया है। वैसे तो माँ काली की पूजा के लिए अनेकों मंत्र हैं, जिनके जाप से माँ काली प्रसन्न होती हैं। परन्तु यदि आप आसान शब्दों में माँ काली को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो आप काली चालीसा का पाठ अवश्य करें। काली माँ को सच्चे ह्रदय एवं श्रद्धा-भक्ति के साथ नियमित रूप से माँ काली चालीसा का पाठ करने से अनंत फायदे प्राप्त होते हैं। जिनमें से कुछ फायदों का वर्णन इस प्रकार है।

  • श्री काली चालीसा के पाठ करने से किसी भी प्रकार की परेशानी, संकट या मुसीबत से छुटकारा मिलता है।
  • श्री काली चालीसा के पाठ से काली माँ प्रसन्न होती हैं। जिससे माँ काली की कृपा प्राप्त होती है।
  • श्री काली चालीसा के पाठ से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। एवं शत्रुओं का नाश होता है।
  • जो भी व्यक्ति सच्चे ह्रदय एवं श्रद्धा-भक्ति के साथ श्री काली चालीसा का पाठ करते हैं, उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। एवं उन्हें मनवांछित फल मिलता है।
  • श्री काली चालीसा का सच्ची श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ करने से सांसारिक मोह, माया, भव बंधन से मुक्ति मिलती है।
  • श्री काली चालीसा के पाठ से माँ काली की कृपा बनी रहती है। एवं माँ काली उनकी समस्त प्रकार से रक्षा करतीं हैं।
  • जो भक्त सच्चे हृदय एवं श्रद्धा भक्ति के साथ श्री काली चालीसा का पाठ करता है। उसे मृत्यु के उपरांत स्वर्ग में स्थान मिलता है।
  • अष्टभुजी माँ काली को सुखदायक कहा जाता है। श्री काली चालीसा के पाठ से हर प्रकार की सुख-सुविधाओं की प्राप्त होती है।

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