Chanakya Niti in Hindi pdf: चाणक्य नीति शास्त्र पीडीएफ

चाणक्य द्वारा रचित चाणक्य नीति अथवा चाणक्य शास्त्र एक नीति ग्रन्थ है। चाणक्य नीति का संस्कृत-साहित्य में नीतिपरक ग्रंथों की कोटि में एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें जीवन को आनंदमय बनाने हेतु सूत्रात्मक शैली में लाभकारी सुझाव बताये गये हैं।

इसमें मुख्य रूप से मानव मात्र को जीवन के हर पहलू की व्यावहारिक शिक्षा देना है। इसमें प्रमुख रूप से न्याय, शांति, धर्म, शिक्षा संस्कृति सर्वतोन्मुखी मानव जीवन की प्रगति की झाकियों का वर्णन किया जा रहा है। इस नीति परक ग्रन्थ में जीवन व्यवहार एवं जीवन सिद्धांत तथा यथार्थ एवं आदर्श का अतिसुन्दर अंश देखने को मिलता है।

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Chanakya Niti in Hindi pdf संक्षिप्त विवरण

File Name Chanakya Niti in Hindi pdf
File TypePDF
LanguageHindi
CategoryReligion
No. of Pages375 Pages
File Size4.18 MB
File StatusActive
Uploaded ByRajesh Kushwaha

आचार्य चाणक्य का परिचय

चाणक्य-नीतिदर्पण का नीतिवर्णन परत्व संस्कृत ग्रंथों में विशेष महत्व है। जीवन को ध्येयपूर्ण एवं सुखमय बनाने के लिए, अनेक विषयों का वर्णन इसमें सूत्रात्मक शैली से उचित शब्दों में प्राप्त होता है। इसमें राजनीति सम्बन्धी श्लोकों के साथ-साथ व्यव्हार सम्बन्धी सूत्रों का भी इनमे समावेश होता है। आचार्य चाणक्य भारत के महान एवं अतिश्रेष्ठ व्यक्तियों में से एक हैं। और भारत को उनके इतिहास पर गर्व है।

प्राचीन संस्कृत शब्दों की शास्त्रज्ञों की परम्परा में, आचार्य चणक के पुत्र विष्णुगुप्त-चाणक्य का महत्वपूर्ण स्थान है। वे आचार एवं व्यवहार के कुशल, कूटनीति के अतिविशिष्ट ज्ञाता, राजनीतक कुशल अर्थशास्त्र के विद्वान एवं गुणवान समझे जाते हैं। वे इरादे के पक्के, बुद्धि से तीक्ष्ण, स्वाभाव से स्वाभिमानी, प्रतिभा के धनी, स्वरुप से कुरूप, संयमी, युगदृश्टा, एवं युगसृष्टा व् चरित्रवान व्यक्ति थे। वे कर्त्तव्य के लिए अपनी भावनाओं की बलि देने वाले धैर्यमूर्ति थे।

चाणक्य का जन्म 326 ई.स. पूर्व का बताया जाता है। उन्होंने अपने निवास स्थान पाटलीपुत्र (पटना ) से तक्षशिला प्रस्थान कर वहां शिक्षा प्राप्त की। अपने विशेष ज्ञान से विद्वानों को प्रसन्न करके वे वहां पर राजनीति के शिक्षक बने। परन्तु उनका जीवन हमेशा आत्मनिरीक्षण में व्याप्त रहता था।

कुलषित राजनीति एवं सांप्रदायिक मनोवृति से त्रस्त भारत का पतन उनसे सहन नहीं हो पाता था। एवं देश की दुर्व्यवस्था देखकर उनका ह्रदय दुखी हो उठता था। अतः अपनी दूरदर्शी सोंच से उन्होंने देश को एक सूत्र में बांधने के लिए एक विस्तृत योजना बनाकर असमान्य प्रयास किया। उन्होंने भारत के अनेक जिलों का भ्रमण किया, उन्होंने सम्राटों से लेकर शिक्षकों तक में सोई हुई राष्ट्र-निष्ठा की भावना को जगाया। इस सांस्कृतिक एवं राजकीय क्रांति को स्थिर करके अपने पराक्रमी एवं गुणवान शिष्य को सिंहासन पर बैठाया।

चाणक्य का मतलब, स्वार्थ त्या, विद्वानता, साहस एवं निर्भीकता की साक्षात् मूरत से है। वे मगध राजा के महामंत्री होने के पश्चात भी वे सामान्य कुटिया में रहते थे। यह देखकर चीन के विख्यात यात्री फाह्यान ने जब आश्चर्य व्यक्त किया , तब चाणक्य का जवाब था कि, जिस देश के महामंत्री ( प्रधानमंत्री,प्रमुख ) एक सामान्य सी कुटिया में रहता है।

वहां की जनता भव्य भवनों में निवास करती है, परन्तु जिस देश के महामंत्री महलों में रहते हैं, वहां की जनता कुटिया में रहती है। राजमहल की दीवारों में जनता के दुख-दर्द की आवाजें सुनाई नहीं देतीं हैं।

चाणक्य का कहना था कि, “बुद्धिर्यस्य बलंतस्य।” वे एक पुरुषार्थवादी व्यक्ति थे। “देवाधीनं जगत्सवर्म।” के सिद्धांत को मानने के लिए कभी तैयार नहीं थे। सार्वजनिक हित एवं महान ध्येय की पूर्ति में प्रजातंत्र या लोक शिक्षण अनिवार्य है। पर पर्याप्त नहीं ऐसा उनका मानना था।

देश के शिक्षक, रक्षक, विद्वान, निःस्पृही, चतुर एवं साहसी होने चाहिए। स्वजीवन एवं सामाजिक व्यवहार में उन्नत नीति मूल्य का आचरण ही श्रेष्ठ है। लेकिन स्वार्थ भावना सत्तावान या वित्तवानों से आवश्यकता पड़ने पर पत्थर के समान कठोर बनना चाहिए। ऐसा उनका मानना था। इसी वजह से उन्हें “कौटिल्य” कहा जाने लगा।

शिक्षकों एवं राजनीतिज्ञों के लिए चाणक्य का व्यक्तित्व किसी भी देश में, किसी भी काल में अनुकरणीय एवं आदर्श है। उनके चरित्र की महानता का कारण, उनकी दृण प्रतिज्ञां, कर्मनिष्ठा एवं अतुल प्रज्ञां थी। वे साहस, पुरुषार्थ, त्याग, दृढ़ता, एवं तेजस्विता के प्रतीक थे। उनके राजनीतिशास्त्र एवं अर्थशास्त्र के सिद्धांत वर्तमान काल में भी उतने ही उपयुक्त हैं।

चाणक्य-नीति दर्पण ग्रन्थ में, आचार्य चाणक्य जी ने वैदिक ग्रंथों एवं अपने पूर्वजों द्वारा संभाली धरोहर का अध्ययन करके श्लोकों एवं सूत्रों का वर्णन किया है।

उनके विचारों के कुछ उदाहरण

  • अपने बच्चों को पहले 5 वर्ष दुलार के साथ पालना चाहिए। फिर अगले 5 वर्ष उसे डांट-डपटकर के साथ रखना चाहिए। परन्तु जब बच्चा 16 वर्ष का हो जाये, तो उसके साथ एक मित्र के समान सम्बन्ध रखने चाहिए।
  • अगर कोई सर्प विषैला नहीं है, तब भी वह फुफकारना नहीं छोड़ता, उसी प्रकार कमजोर व्यक्ति को भी हर समय अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
  • विप्पति काल के लिए धन बचाएं। यदि परिवार पर संकट पड़े तो धन का मोह त्याग कर उसे कुर्बान कर देना चाहिए। परन्तु स्वयं की रक्षा के लिए हमें धन एवं परिवार को भी दावं पर लगाकर रक्षा करनी चाहिए।
  • आवश्यकता से ज्यादा किसी भी व्यक्ति को सीधा नहीं होना चाहिए। जंगल में लोग सीधे खड़े वाले पेड़ों को ही काटते हैं।
  • कुछ न कुछ स्वार्थ हर मित्रता के पीछे छिपा होता है। संसार में ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों। यह कड़वा सत्य है, किन्तु सत्य है।

चाणक्य नीति के दूसरे अध्याय की कुछ बातें

  • विवाह के समय भी बताया जाता है कि, 7 फेरों के पश्चात पत्नी अपने पति से कोई भी बात नहीं छिपाएगी। परन्तु वास्तविक जीवन में असलियत कुछ और है। आपको यकीन न हो, किन्तु यही सत्य है। कुछ बातें इस प्रकार की होतीं हैं कि, पत्नी अपने पति को कभी नहीं बताती है।
  • आचार्य चाणक्य माता लक्ष्मी एवं धन के सम्बन्ध में भी अनेक बातें कहते हैं। उनका विचार था क़ि, माता लक्ष्मी चंचल प्रवृति की हैं। इसलिए उनको एक स्थान पर रूक कर रखना संभव नहीं होता है। वैसे कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जो माता को काफी प्रिय होते हैं। एवं इन स्थानों को वह सरलता से नहीं छोड़तीं हैं।
  • आचार्य चाणक्य के अनुसार, मित्रता बराबर वाले व्यक्तियों के साथ ही करना उचित होता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है। एवं अच्छे व्यापार के लिए व्यवहार कुशल होना जरुरी होता है। इसी प्रकार सुन्दर एवं गुणवान स्त्री घर में शोभा देती है।
  • जिस प्रकार पत्नी के बिछुड़ने का दुःख, अपने भाई-बंधुओं से मिले अपमान का दुःख अत्यंत पीड़ा दायक होता है। उसी तरह कर्ज से बोझिल व्यक्ति भी हर वक़्त दुखी रहता है। मनुष्य गरीब होने का अभिशाप भी कभी नहीं भूल पाता, दुष्ट राजा की सेवा करने वाला नौकर भी दुखी रहता है। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर सुलगती रहती है।
  • हमें अपना प्रत्येक कदम फूक-फूंक कर रखना चाहिए। हमें छाना हुआ जल पीना चाहिए। हमें वही काम करना चाहिए, जिसके बारे में हम सावधानीपूर्वक विचार कर चुके हैं। हमें वही बात बोलनी चाहिए, जो शास्त्र सम्मत है।
  • चाणक्य कहतें हैं कि, नदी के किनारे स्थित पेड़ों का जीवन स्थाई नहीं होता, क्योंकि नदियां बाढ़ के वक अपने किनारे स्थित पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी तरह दूसरों के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी वक़्त पतन की राह पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास उचित सलाह देने वाला सलाहकार न हो, वह भी ज्यादा वक़्त तक सुरक्षित नहीं रह सकता है। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
  • अशुद्ध स्थान पर रहने वाले, बुरे चरित्र वाले, बिना वजह दूसरों को तकलीफ देने वाले व्यक्ति के साथ जो व्यक्ति दोस्ती करता है, वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य के अनुसार, मनुष्य की भलाई इसी में है कि, वह जितनी जल्दी संभव हो सके, दुष्ट व्यक्तियों का साथ छोड़ दें।
  • चाणक्य के अनुसार, जिस प्रकार वैश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी प्रकार जब राजा बलहीन हो जाता है, तब प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी तरह पेड़ों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी पेड़ पर बसेरा रखते हैं, जब तक उन्हें वहां से फल मिलते रहते हैं। जब अतिथि का सेवा-सत्कार कर दिया जाता है, तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
  • जिस प्रकार समस्त हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, समस्त वनों में चन्दन के पेड़ नहीं होते, जिस प्रकार समस्त पर्वतों में मणि नहीं मिलती, उसी तरह सब जगहों पर सज्जन पुरुष नहीं मिलते हैं।
  • चाणक्य के अनुसार, जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूर्णतयः संतुष्ट रहता है। जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है। इस प्रकार के व्यक्ति के लिए यह दुनिया ही स्वर्ग की तरह है।
  • चाणक्य कहते हैं कि, मूर्खता के समान यौवन भी कष्टदायी होता है। क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खता पूर्वक कार्य कर सकता है। लेकिन इनसे भी ज्यादा दुखदायी दूसरों पर निर्भर रहना होता है।
  • चाणक्य के अनुसार, व्यक्ति को अपने मन का भेद कभी नहीं बताना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, अपने मन में रखें। एवं तन्मयता के साथ उचित समय पर उसे पूरा करना चाहिए।
  • छल-कपट करना,लालच करना ,झूंठ बोलना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, उतावलापन दिखाना, अपवित्रता, निर्दयता एवं दुस्साहस करना, ये समस्त स्त्रियों के स्वाभाविक अवगुण हैं। आचार्य चाणक्य इन समस्त अवगुणों को स्त्रिओं का स्वाभाविक गुण मानते हैं। वैसे वर्तमान समय में शिक्षित स्त्रियों में इन अवगुणों का होना नहीं कहा जा सकता।
  • चाणक्य का कहना है कि, जो व्यक्ति अच्छा दोस्त नहीं है, उस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही अच्छे दोस्त पर भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि अगर वह नाराज हो गया, तो आपके समस्त राज खोल सकता है। अतः सावधानी बहुत जरुरी है।
  • चाणक्य का मानना है कि, ज्यादा लाड-प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष जन्म लेते हैं। इस कारण यदि वे कोई अनुचित कार्य करते हैं। तो उसे नजर अंदाज कर लाड-प्यार करना सही नहीं है, बच्चों को डाटना भी जरुरी है।
  • चाणक्य का मानना है कि, बचपन में बच्चों को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका उसी प्रकार विकास होता है। इसलिए माता-पिता का कर्त्तव्य है कि, वे उन्हें ऐसी शिक्षा दें, जिससे उनमें अच्छे चरित्र का विकास हो, क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
  • चाणक्य का मानना है कि, भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का होना, उन्हें पचाने के लिए शक्ति का होना, अत्यधिक धन होने के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना, ये समस्त गुण मनुष्य को काफी कठिनाइयों से मिलते है।
  • चाणक्य कहते हैं कि, जो मित्र आपसे चिकनी-चुपड़ी बातें करता है। और पीठ पीछे आपकी बुराई करता हो, उसको त्याग देने में ही भलाई है। क्योंकि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपरी भाग में दूध लगा हो परन्तु अंदर जहर भरा होता है।
  • वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दिए। क्योंकि अशिक्षित जैसे व्यक्तियों का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार बेज्जती होती है, जैसे- हंसों के झुण्ड में बगुले की स्थिति होती है। अशिक्षित व्यक्ति बिना पुंछ के जानवर के समान होता है, इसलिए माता-पिता का कर्त्तव्य है कि, वे अपने बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा दें, जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
  • चाणक्य का कहना है कि, वही परिवार सुखी है, जिसके बच्चे उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। पिता का भी कर्तव्य है कि, वह बच्चों का पालन-पोषण भली-भांति करे। इसी प्रकार ऐसी पत्नी व्यर्थ है, जिससे किसी तरह का सुख न मिले और ऐसे व्यक्ति को दोस्त नहीं खा जा सकता, जिस पर भरोसा न किया जा सके।
  • आचार्य चाणक्य कहते हैं कि, मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है। इसलिए हमे ज्यादा से ज्यादा वक़्त का वेदादि शास्त्रों के अध्य्यन में तथा दान जैसे उत्तम कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

आचार्य चाणक्य की कुटिया

पाटली पुत्र में अति ज्ञानी आचार्य चाणक्य काफी न्यायप्रिय व् विद्वान होने के साथ- साथ एक सज्जन, ईमानदार एवं सीधे-साधे व्यक्ति थे। वे इतने विशाल साम्राज्य मे महामंत्री होने के पश्चात भी एक छप्पर से निर्मित कुटिया में निवास करते थे। उनका रहन-सहन एक सामान्य व्यक्ति की तरह था। एक बार उसे मिलने यूनान का राजदूत दरबार में आया। कूटनीति एवं राजनीति में दक्ष चाणक्य की चर्चा सुनकर राजदूत काफी प्रसन्न हुआ। राजदूत ने शाम को चाणक्य से मिलने का वक़्त माँगा।

आचार्य चाणक्य ने कहा, आप रात को मेरे घर आ सकते है। चाणक्य के व्यवहार से राजदूत काफी खुश हुआ। जब वह शाम को राजमहल परिसर में “आमात्य निवास” के सम्बन्ध में पूंछने लगा तब राज प्रहरी ने बताया कि, आचार्य चाणक्य तो नगर के बाहर निवास करते हैं। राजदूत ने समझा कि, महामंत्री का शायद नगर के बाहर सरोवर पर बना आकर्षक महल होगा।

राजदूत नगर के बाहर गया। एक नागरिक से पूंछा कि, आचार्य चाणक्य कहाँ रहते हैं। एक कुटिया की तरफ इशारा करे हुए नागरिक ने कहा कि, देखिये वह सामने महामंत्री की कुटिया है। राजदूत अचंभित रह गया। उसने कुटिया में जाकर चाणक्य के पैर छुए एवं शिकायत की कि, आप जैसा विद्वान, चतुर महामंत्री एक कुटिया में निवास करते हैं।

इस पर चाणक्य ने जवाब दिया कि, अगर मै जनता की कड़ी मेहनत एवं पसीने की कमाई से बने महलों में निवास करूँगा, तो मेरे देश की जनता को कुटिया भी नसीब नहीं होगी। चाणक्य की ईमानदारी पर यूनान राजदूत नतमस्तक हो गया।

आचार्य चाणक्य की सीख

आचार्य चाणक्य एक जंगल में झोपडी बनाकर निवास करते थे। वहां बहुत लोग उनसे ज्ञान एवं परामर्श लेने के लिए जाते थे। वह जिस जंगल मे रहते थे, वह कटीली झाड़ियों एवं पत्थरों से भरा था। चूँकि उस वक़्त नंगे पैर चलने का ही प्रचलन था। इसलिए उनके निवास तक पहुँचने में लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। वहां पहुंचते पहुँचते लोगों के पैर लहुलुहान हो जाते थे।

एक दिन उस रास्ते से कुछ लोग काफी दिक्क्तों का सामना करते हुए चाणक्य के पास पहुंचे। एक व्यक्ति ने उनसे निवेदन करते हुए कहा कि, आपके पास तक आने में हम लोगों को काफी परेशानी हुई है। आप महाराज से कहकर यहां की जमीन को चमड़े से ढकवाने की सुविधा करा दें। लोगों को इससे आराम मिलेगा।

आचार्य चाणक्य उसकी बात सुनकर मुस्कुराते हुए बोले कि, महाशय, सिर्फ यहीं चमड़ा बिछाने से समस्य समाप्त नहीं होगी। पथरीले एवं कटीले रास्ते तो इस संसार में बहुत हैं। ऐसे में समस्त संसार में तो चमड़ा बिछवाना संभव नहीं है। यदि आप लोग अपने पैरों को चमड़े द्वारा सुरक्षित कर लें, तो अवश्य ही पथरीले मार्ग एवं कटीली झाड़ियों की समस्या से बच सकते हैं। वह व्यक्ति सर झुकाकर बोला, हाँ गुरूजी अब मै ऐसा ही करूँगा।

इसके पश्चात चाणक्य ने कहा कि, “देखो मेरी इस बात के पीछे भी गहरा राज है। मतलब दूसरों को सुधारने के बजाय स्वयं को सुधारो। इससे तुम अवश्य अपने कार्य में विजय प्राप्त करोगे। संसार को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता।जबकि खुद पालन करने वाला कामयाबी की उचाईयों तक पहुँच जाता है।” सभी इस बात से सहमत हुए।

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